Fri. Apr 23rd, 2021

शहाबुद्दीन के दहशत से लड़ते—भीड़ते चंदा बाबू आखिर चले ही गए

शहाबुद्दीन

पटना: बिहार के रहवासियों के लिए न तो चंदा बाबू किसी परिचय के मोहताज है और न ही शहाबुद्दीन। हरेक वर्ष मीडिया में शहाबुद्दीन के किस्से छपते रहते हैं और वो दास्तां भी किस तरह का जुल्म शहाबुद्दीन ने चंदा बाबू पर किया था। शहाबुद्दीन जेल में है और आज चंदा बाबू भी नहीं रहे। लेकिन इस मौके पर चंदा बाबू को जीवन यात्रा को सामने रखने के साथ ही वह वाक्या भी खुद बखुद सामने आ जायेगा जो उनको जीवन भर का दर्द दे गया लेकिन झुकने के बजाय उन्होंने हिम्मत न हारी और शहाबुद्दीन को उसके सही ठिकाने पर पहुंचाया।

शहाबुद्दीन के दहशत

चंदा बाबू उर्फ चंद्रकेश्वर प्रसाद 16 अगस्त, 2004 की काली सुबह

फलैश बैक में चलते हुए आज घूम आते हैं 16 अगस्त 2004 की ओर जब सीवान के व्यवसायी चंद्रकेश्वर प्रसाद दोनों छोटे बेटे गिरीश और सतीश की तेजाब से नहला कर हत्या कर दी गई थी। इसके बाद फिर 16 जून 2014 को उनके बड़े बेटे और दोनों भाइयों की हत्या का चश्मदीद गवाह राजीव रौशन की गोली मार कर हत्या कर दी गयी थी। ये उन दिनो की बात है सीवान में दो दुकानों के मालिक चंदा बाबू को दो लाख रुपए की रंगदारी के लिए फोन आ रहे थे। चंदा बाबू रंगदारी के उन फोन कॉल्स को इग्नोर रहे थे। इस बीच किसी काम से वह पटना निकल गए अपने भाई के पास, जो रिजर्व बैंक में अधिकारी थे। जबकि इस मामले का चश्मदीद रहे राजीव किसी तरह बदमाशों की गिरफ्त से अपनी जान बचाकर भाग निकला। बाद में राजीव भाइयों के तेजाब से हुई हत्याकांड का गवाह बना।
इतना सब हो जाने के बावजूद भी चंदा बाबू ने हिम्मत न हारी और सीवान में रहना कबूल किया। उन्होंने तय किया कि अब चाहे जान ही क्यों न चली जाए, सीवान में ही रहेंगे और वहीं से लड़ाई लड़ेंगे। वर्ष 2005 में नीतीश कुमार सत्ता में आए। नीतीश सरकार ने शहाबुद्दीन पर कार्रवाई शुरू की। इसी दौरान राजीव की शादी होती है और दोनों बेटों की हत्या के केस में अदालती कार्यवाही शुरू होती है। राजीव तेजाब हत्याकांड का चश्मदीद गवाह था। मगर 2015 में शहर के डीएवी मोड़ पर उसकी भी गोली मार कर हत्या कर दी गई। हत्या के महज 18 दिन पहले ही राजीव की शादी हुई थी। इस घटना के बाद पूरे शहर में हड़कंप मच गया था।

शहाबुद्दीन के दहशत

हार गए थे चंदा बाबू बोला..’भगवान मार दे या शहाबुद्दीन’

राजीव की हत्या के दो साल बाद जब शहाबुद्दीन को इस दोहरे हत्याकांड में जमानत मिल गई तो चंदा बाबू टूट गए थे और सबकुछ भगवान के भरोसे छोड़ दिया। उन्होंने उस समय कहा था, ‘ऐसी बातों से अब दुख नहीं होता। अब मैं इसे हार-जीत के रूप में नहीं देखता क्योंकि जिंदगी में सब कुछ और सब जगह हार चुका हूं। अब मेरे लिए मायने नहीं रखती कि हत्या के मामले में क्या होगा या क्या हो रहा है। अब सिर्फ एक मात्र चिंता अपने विकलांग बेटे और बीमार पत्नी की है। पत्नी 65 साल की हो गई है और मैं 70 का।’ उन्होंने कहा, ‘तीन बॉडीगार्ड मिले हैं, लेकिन बॉडीगार्ड का क्या भरोसा। हम छुपकर भी कहां जाएंगे। मरना तो है ही एक दिन। अब हमें भगवान मार दे या शहाबुद्दीन।’
इस अपराधिक नृशंषता से कोई भी हिम्मत हार जाता। लेकिन चंदा बाबू तो मानो अलग ही मिट्टी के बने हों। इतने जुल्मो-सितम के बाद भी चंदा बाबू व उनकी पत्नी अपने एक अपाहिज बेटे के साथ सीवान में डटे रहे और शहाबुद्दीन को सलाखों के पीछे पहुंचा कर ही दम लिया। पिछले साल ही उनकी पत्नी कलावती की मृत्यु हुई। पत्नी के साथ छोड़ने के बाद चंदा बाबू अक्सर बीमार रहने लगे। इसके बाद विकलांग बेटा और राजीव की विधवा ही उनकी जिंदगी का सहारा रह गए थे।
बुधवार रात में उन्हें सांस लेने में तकलीफ के बाद परिजन अस्पताल ले गए। जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। इस तरह लंबी बीमारी के बाद 16 दिसंबर 2020 को हार्ट अटैक से उनकी भी मौत हो गई। इसी मामले में सिवान के पूर्व बाहुबली सांसद मोहम्मद शहाबुद्दीन दिल्ली के तिहाड़ जेल में बंद हैं।

 

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

बिहार एक्सप्रेस ताज़ा ख़बरें