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चंद्रशेखर की भारत यात्रा की सबक में छिपा है भारत के समृद्धी का राज

भारत यात्रा

नयी दिल्ली: आज युवा तुर्क चंद्रशेखर के भारत यात्रा की 38 वर्षगांठ है। चंद्रशेखर ने 6 जनवरी, 1983 से 25 जून, 1983 तक देशवासियों से मिलने एवं उनकी महत्वपूर्ण समस्याओं को समझने के लिए की गई अपने वक्त की बहुचर्चित ‘भारत यात्रा’ की थी। उनके इस पदयात्रा का एकमात्र लक्ष्य था – लोगों से मिलना एवं उनकी महत्वपूर्ण समस्याओं को समझना। इस दौरान उन्होंने केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गुजरात, उत्तर प्रदेश एवं हरियाणा सहित देश के विभिन्न भागों में लगभग पंद्रह भारत यात्रा केंद्रों की स्थापना की गई थी।
अपनी भारत यात्रा के विषय में खुद चंद्रशेखर कहते हैं कि रात का समय था। पहाड़ी रास्ता था जो जंगल से होकर गुजर रहा था। एक बूढ़ी महिला अपनी झोपड़ी के आगे लालटेन लेकर खड़ी थी। यात्रा चाहे केरल से निकली या तमिलनाडु से या कर्नाटक या महाराष्ट्र से, कोई गांव, कोई शहर या कस्बा ऐसा नहीं मिला जहां भाषा ने रूकावट डाली हो। भाषा,धर्म,जाति, क्षेत्र और ऐसी पहचानें भारत यात्रा में मददगार ही बनी। यात्रा भारत को जानने की भक्ति से भरी साधना थी। भारत को जानने का सीधा सा मतलब उन लोगों को जानना है जो यहां रहते हैं, जो रोज ब रोज जीवन की हकीकतों से जूझते हैं।

भारत यात्रा
और इसी ग्रामीण भारत को जानने की भक्ति से भरी साधना में चंद्रशेखर ने अपनी भारत यात्रा में इन पांच मुद्दों को तवज्जो दी और उसे ही अपनी भारत यात्रा का उद्देश्य के रूप में सामने रखा।

ये मुद्दे थे:

जल संरक्षण,
पोषण युक्त अहार,
प्राथमिक शिक्षा,
दलित-आदिवासी समाज का उत्थान,
समाजिक समरसता

चंद्रशेखर भारत यात्रा के दौरान वे कई जगहों पर ठहरे और उनमें से कुछ को ​भारत यात्रा केंद्र के नाम से विचारों का केंद्र बनाया। इनमें से ही एक है लगभग 600 एकड़ में फैला भोंडसी स्थित भारत यात्रा केंद्र। बाद के वर्षों में सियासत का केंद्र बनने की वजह से भोंडसी आश्रम तो याद रहा, लेकिन वह यात्रा जेहन से मिटा दी गई।

बीते साल एक किताब आई थी- चंद्रशेखर द लास्ट आइकन ऑफ आइडियोलॉजिकल पॉलिटिक्स (The Last Icon of Ideological Politics)। हरिवंश की लिखी इस किताब का विमोचन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया था। इस दौरान भारत यात्रा को भुलाए जाने की टीस उन्होंने जाहिर की थी।
स्पष्ट है चंद्रशेखर के प्रधानमंत्री बनने से कहीं ज्यादा महत्व उनकी उस लंबी राजनीतिक यात्रा का है, जिसमें तमाम ऊंचे-नीचे व ऊबड़-खाबड़ रास्तों से गुजरने और परिस्थितियों के एकदम अनुकूल न रह जाने पर सीमाओं में बंधते जाने के बावजूद वे समाजवादी विचारधारा से पल भर को भी अलग नहीं हुए नेता के तौर पर अपनी जनता को सच्चा नेतृत्व देने के लिए उन्होंने लोकप्रियतावादी कदमों से परे जाकर अलोकप्रिय होने के खतरे तो उठाये ही, अपने समूचे राजनीतिक जीवन में अपनी ही हथेलियों पर कांटे चुभो-चुभोकर गुलाब उकेरते रहे। यह चंद्रशेखर ही थे जो इतने विषम पथ का राही होने के बावजूद उन्होंने कभी राजनीतिक रिश्ते इस आधार पर नहीं बनाये कि कौन कितनी दूर तक उनके साथ चला।
आज जब कोरोना जैसी वैश्विक महामारी ने इस कदर पूरी व्यवस्था को जकड़ लिया है कि लोग फिर से गांव को याद करने लगे हैं। ऐसे समय इस कोरोना संकट के समय जिस तरह से शहर में लोग लॉक डाउन पीरियड को काटने के लिए गांव लौटने की आपाधापी मचाये हुए थे उससे यही लगता है कि गांव का पुर्नजीवन का रास्ता नये सिरे से सोचे जाने की कवायद शुरू हो गई है और उसका सूत्र वाक्य चंद्रशेखर ने भारत यात्रा के दौरान जिन सात बिंदुओं को प्रमुखता से रखा था उसी में गांव की तरक्की का राज छुपा हुआ है।

 

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