Wed. Nov 13th, 2019

सामा-चकेवा का त्यौहार- बिहार के घरों में गीत के गूंज, जानिए परंपरा

सामा-चकेवा का त्यौहार भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक है। यह लोक पर्व सामा-चकेवा शुरू हो गया है। यह त्यौहार बहनों के लिए बहुत ही ख़ास होता है और इस त्यौहार को ये बड़े दिल से मनाती हैं। शाम होते ही बहनें अपनी सखी सहेलियों संग टोली में लोकगीत गाती हुईं अपने-अपने घरों से बाहर निकलती हैं। सभी बहनें डाला में सामा चकेवा को सजा कर सार्वजनिक स्थान पर बैठ कर गीत गाती हैं। सामा खेलते समय वे गीत गाकर आपस में हंसी-मजाक भी करती हैं। यह त्यौहार बहुत ही धूम-धाम से मनाया जाता है।

आठ दिन तक मनाया जाता है सामा-चकेवा का त्यौहार

इस त्यौहार में भाभी ननद एक दूसरे से लोकगीत की भाषा में काफी हसी मज़ाक करती हैं। उसके बाद अंत में चुगला का मुंह जलाया जाता है और सभी युवतियां व महिलाएं पुन: लोकगीत गाती हुई अपने – अपने घर वापस आ जाती हैं। यह परंपरा 11 नवंबर तक चलेगी। वो सभी इतने दिन तक ऐसे ही एक साथ यह लोक पर्व सामा-चकेवा मनाएंगी।

 

 

यह भी पढ़ें- सबसे बड़े खादी मॉल का हुआ उद्घाटन हुआ सीएम नीतीश कुमार के हाथों से

भाई-बहन के रिश्ते को करता है मजबूत

इस त्यौहार के बारे में लाभ बताते हुए शास्त्री नगर, कन्हौली के विमल कुमार कहते हैं कि यह सामा-चकेवा का उत्सव मिथिला की प्रसिद्ध संस्कृति और कला का एक अंग है, जो सभी समुदायों के बीच व्याप्त सभी बाधाओं को तोड़ता है। यह उत्सव कार्तिक शुक्ल पक्ष से सात दिन बाद शुरू होता है। यह भाई-बहन का लोक पर्व है। यह ख़ास पर्व को आठ दिन तक मनाया जाता है।

उसके बाद आखरी यानी नौवें दिन पूर्णिमा को सभी बहनें अपने भाइयों को धान की नई फसल का चूड़ा एवं दही खिला कर सामा-चकेवा की मूर्तियों को तालाबों में विसर्जित कर देती हैं। गांवों में तो इसे जोते हुए खेतों में विसर्जित किया जाता है। यह उत्सव भाई- बहन के सम्बन्ध को मजबूत करता है। उनके रिश्ते में प्यार बढ़ता है। रक्षा बंधन की तरह यह पर्व भी बहुत ख़ास होता है। भाई-बहन के रिश्ते की तरह इनके त्यौहार भी अनमोल होते हैं।

बिहार की राजनीति, मनोरंजन, जीवनशैली, खेल इत्यादि से जुड़ी ख़बरें अब सिर्फ बिहार एक्सप्रेस पर

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *