Mon. Oct 18th, 2021

हुक्मरान भले पर्दा डालें लेकिन अन्नदाताओं को पता है वो तीसरा आदमी कौन है…

अन्नदाताओं

नयी दिल्ली: एक आदमी रोटी बेलता है
एक आदमी रोटी खाता है
एक तीसरा आदमी भी है
जो न रोटी बेलता है, ना रोटी खाता है
वह सिर्फ़ रोटी से खेलता है
मैं पूछता हूँ…
यह तीसरा आदमी कौन है?
मेरे देश की संसद मौन है।।
लेकिन देश के अन्नदाताओं ने उस तीसरे आदमी को पहचान लिया है और उन्हें पता है कि देश की संसद मौन नहीं बल्कि पूरी सियासत उस तीसरे के पक्ष में खड़ी है और अन्नदाताओं को ठंड में ठिठुरने के लिए मजबूर कर रही है। प्रदर्शन कर रहे अन्नदाताओं का कहना है कि ये तीसरा आदमी अंबानी और अडानी है जो हमारी खेती को खत्म करना चाहता है और हमारी चुनी हुई सरकार जो बार—बार ये दावा करते हुए नहीं चूकती कि ये सरकार किसानों की सरकार है और उन्हीं के फायदे के लिए ये तीन कृषि कानून लाई है। लेकिन ऐसा क्या है कि अन्नदाता उसी कृषि कानून को वापस लाने के लिए इन सर्द रातों में सड़क पर सोने को मजबूर हो रहा है। सड़क जाम कर दिया है रेल रोकने के दावे हो रहे हैं। नेशनल हाईवे बंद कर देना चाहता है और अपनी ही चुनी हुई सरकार पर भरोसा नहीं कर रहा है। लेकिन इन सवालों का जवाब जानने से पहले यह जानना भी जरूरी है आखिर हमारा अन्न दाता अभी किस हाल में है।

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तथ्य तो यही है कि नेता का बेटा नेता बनना चाहता है, अधिकारी का बेटा अधिकारी,व्यापारी का बेटा व्यापारी,डॉक्टर का बेटा डॉक्टर और इंजीनियर का बेटा इंजीनियर। लेकिन आंकड़े बताते हैं कि किसान का बेटा किसान नहीं बनना चाहता है और वह दिनों दिन खेत और खेती से विमुख होता जा रहा है। यानी कृषि प्रधान कहे जाने वाले इस देश में कायदे से छोटे और बेहद गरीब किसानों की तादाद 75 फीसदी है। ये 75 फीसदी वो किसान हैं जिनके पास पांच बीघा से कम ज़मीन है। साल में ये दो फसल काटते हैं। नाबार्ड के 2016-17 के एक सर्वे के मुताबिक भारत में एक किसान की मासिक आमदनी सिर्फ 8,931 रुपये है। जबकि देश में करीब 18 लाख स्क्वॉयर किलोमीटर की ज़मीन पर खेती होती है।
इस दुरावस्था के बावजूद आखिर किसान खेती क्यों करना चाहेगा? लेकिन फिर ऐसे में ये सवाल भी है कि आखिर उसी खेती को बचाने के लिए वो इन सर्द रातों में 15 दिन से घर—बार छोड़ कर जमा क्यों हुआ है? जवाब ये है कि मरता क्या न करता। आखिर खेती नहीं करेगा तो करेगा क्या? फिर ये सवाल उठता है कि क्या सचमुच ये सरकार किसान विरोधी है या वो तीन कानून जिसके लिए किसान किसी भी हद तक जाने को तैयार है। इस तथ्य के बावजूद कि सरकार उन्हें बार-बार दिलासा दे रही है कि सरकार किसानों की आमदनी दो गुना करने चाहती है। फसल के डेढ़ गुना दाम देने की दिशा में आगे बढ़ रही है। समय—समय तक कर्ज माफी भी होती है और मोदी सरकार ने किसानो के बैंक खाते में सालाना 6 हजार नकदी भी ट्रांसफर कर रही है। फिर वही सवाल कि ऐसा क्या है किसान के लिए खेती लाभप्रद नहीं है और उसका बेटा, उसकी संतती इस घाटे के सौदे से विमुख हो रही है। इसके मूल में है खेती की बढ़ती लागत और बाजार का बढ़ता चक्रव्यूह और किसान का आरोप है कि उसी बाजार के हवाले सरकार कृषि को करके उनके पेट पर लात मारने की तैयारी में है। उनकी खेती को छीनकर कॉरपोरेट के हवाले करना चाहती है जिससे पहले ही आत्महत्या करने को मजबूर किसान इस तरह के कृषि कानून के बाद और प्रताड़ित होगा।

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ऐसे में आपके जेहन में भी ये सवाल आता होगा और जो सवाल किसानों को परेशान कर रहा है कि सरकार ये कानून अंबानी और अडानी को फायदा पहुंचाने के लिए लेकर आई है और किसान आंदोलन ने एक सूर से ये आवाज लगाई है आंदोलनरत किसान रिलायंस जियो के सिम नहीं इस्‍तेमाल करेंगे। अगर किसी के पास जियो का सिम है तो उसे दूसरे सर्विस प्रोवाइडर में पोर्ट कराया जाएगा। रिलायंस और अडानी ग्रुप के हर स्‍टोर, मॉल व सेवा का ये किसान बहिष्‍कार करेंगे। आइए जानते हैं कि देश के सबसे बड़ी कारोबारी समूहों में शामिल, रिलायंस और अडानी ग्रुप आंदोलनरत किसानों के निशाने पर क्‍यों हैं?
ये भी सवाल है कि जो खेती किसानों के लिए घाटे का सौदा वही खेती अंबानी और अडानी जैसे कॉरपोरेट के लिए फायदे का सौदा कैसे साबित होगा। जवाब ये है कि इस पूरे कोरोना महामारी के दौर में जब चहुंओर अंधियारा था तब हमारे यही अन्नदाता ने देश के उन बेजुबानों को भी भरपेट राशन खिलाया और जुबान वालों को भी भूखे नहीं सोने दिया और अर्थव्यवस्था को कुछ हद तक गती भी दी। वहीं दूसरी ओर जब चहुंओर तालाबंदी थी और जब छोटे से लेकर बड़े उद्योग धंधे बिखर रहे थे,अंबानी अडानी के मुनाफ़े में कई गुना वृद्धि की खबरें लोगों को चकित कर रहे थे। उसी अडानी और अंबानी समूह का देश के कृषि बाजार पर नजर है। किसान प्रतिनिधियों का आरोप है कि वह अनाज भंडारण के लिए भंडारण की सुविधा तैयार कर रहा है ताकि अनाज इकट्ठा करके उन्हें ऊंचे दाम पर खुले बाजार में बेचा जा सके। सार्वजनिक वितरण (पीडीएस) यानी राशन में बांटने के लिए किसानों से फसलों की खरीदगी फूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (एफसीआई) करता है। किसान संगठनों का ये भी आरोप है कि अनाज की आवाजाही में अडानी ग्रुप की सहायता के लिए एक निजी रेलवे लाइन का इस्तेमाल किया जा रहा है।
ऐसा भी नहीं है कि किसानों का ये आरोप शून्य में हो। यह तथ्य सर्वविदित है बिहार से लेकर पंजाब तक में भारतीय खाद्य निगम अडानी समूह से भंडारण के लिए करार कर चुका है।अडानी ने बड़े बड़े भंडारण गृह बना भी दिए हैं और इसके लिए एफसीआई ने तीस साल तक किराया देने की गारंटी सुनिश्चित की है। अडानी की कंपनी ने यह काम शुरू कर भी दिया है। ऐसे में किसानों को सरकार की मंशा पर संदेह होता है और उन्हें लगता है कि सरकारी मंडियों को खत्म कर खुले बाजार को मंडी बनाने और खरीदगी का हक देकर सरकार अडानी को फायदा पहुंचाना चाहती है। किसानों को शंका है कि अडानी समूह ऐसी सुविधायें तैयार कर रहा है जहां अनाज स्‍टोर करके रखा जाएगा और बाद में उन्‍हें ऊंची कीमत पर बेचा जाएगा। जो अडानी ग्रुप आज एफसीआई के लिए भंडारण कर रहा है उन्हीं भंडार गृहों को खुद के द्वारा खरीदे गये अनाजों से भरेगा और मुंहमांगे तरीके बाजार के उतार चढ़ाव को तय करेगा। हालांकि अडानी ग्रुप का मानना है कि ‘वर्तमान मुद्दों के सहारे जिम्‍मेदार कॉर्पोरेट पर कीचड़ उछालने की कोशिश की जा रही है।’

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वहीं यदि अंबानी और जियो की बात करें तो साल 2017 में मुकेश अंबानी ने कृषि क्षेत्र में निवेश की इच्छा जताई थी। जियोकृषि नाम का एक ऐप है। जियो प्लेटफॉर्म की फेसबुक के साथ बड़ी पार्टनरशिप भी हुई है। कहा जा रहा है कि इनकी नजर देश के छोटे बिजनेस वर्ग पर है। रिलायंस का कहना है कि ऐप का उद्देश्य खेत से लेकर आपके खाने की प्लेट तक सप्लाई चेन बनाना है। कंपनी का दावा है कि वह अपने 77% फल सीधे किसानों से खरीदती है। विरोध कर रहे किसानों का कहना है कि नए कानून इस तरह से बनाए गए हैं कि उससे ऐसे बड़े कारोबारियों को फायदा होगा। लेकिन किसान संगठन कह रहे हैं कि अंबानी जैसे कारोबारियों को कृषि क्षेत्र में बड़ा मुनाफा दिख रहा है और इन कानूनों से उनको ही फायदा होगा।

 

 

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