Tue. Jan 26th, 2021

‘दिल्ली हो या पटना’… बिहार के सियासत की धुरी बना रहेगा सरोकारी राजनीति का यह ‘सुशील’

बिहार के राजनीति

नयी दिल्ली: बिहार में नयी सरकार के गठन के बाद ‘उपमुख्यमंत्री’ न बनाये जाने के बाद सुशील मोदी ने ट्यूट कर कहा था,‘भाजपा एवं संघ परिवार ने मुझे 40 वर्षों के राजनीतिक जीवन में इतना दिया की शायद किसी दूसरे को नहीं मिला होगा। आगे भी जो ज़िम्मेवारी मिलेगी उसका निर्वहन करूंगा। कार्यकर्ता का पद तो कोई छीन नहीं सकता।’
इस भाषा ने इन कयासों का बाजार शुरू हो गया कि अब बिहार के सियासत में सुशील मोदी के दिन लद गये। उपमुख्यमंत्री न बनाये जाने से सुशील मोदी नाराज हैं। इस ट्वीट के बाद केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने ट्वीट किया और कहा कि आदरणीय सुशील जी आप नेता हैं, उप मुख्यमंत्री का पद आपके पास था, आगे भी आप भाजपा के नेता रहेंगे, पद से कोई छोटा बड़ा नहीं होता।’ लेकिन जो लोग राजनीति के इस ‘सुशील’ को जानते हैं उन्हें पता था सुशील कुमार मोदी की भाजपा की सियासत विशेष रूप से बिहार की सियासत में क्या महत्व है। साफ था, पार्टी उन्हें नयी जिम्मेवारी देने वाली है और वो जिम्मेवारी थी केंद्र के राजनीति का। संयोग से रामविलास पासवान के देहांत के बाद सीट खाली हुई और एनडीए के तरफ से सुशील मोदी उम्मीदवार बनाए गये और निर्विरोध चुन लिए गए। दो दिन पहले ही शपथ ग्रहण भी हुआ है। लेकिन जानकारों की माने तो सुशील मोदी जैसे कद के नेता को भाजपा सिर्फ राज्यसभा के सदस्य के रूप में सेवा नहीं लेगी और जल्द ही होने वाले मंत्री मंडल विस्तार में उन्हें कोई महत्वपूर्ण मंत्रालय मिल सकता है। वैसे तो बिहार के वित्त मंत्री के रूप में सुशील मोदी के पास वित्तमंत्रालय के कामकाज का बड़ा अुनभव है। ऐसे में पार्टी के करीबी सूत्रों का कहना है कि सुशील मोदी वित्त मंत्रालय जैसा महत्वपूर्ण दिया जा सकता है। वहीं कुछ लोग यह भी कयास लगा रहे हैं उन्हें कृषि मंत्रालय की जिम्मेवारी मिल सकती है क्योंकि मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में यह मंत्रालय बिहार से जुड़े नेता राधामोहन सिंह के पास था। अभी वतर्मान कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के पास कृषि मंत्रालय के साथ ग्रामीण विकास जैसा बड़ा मंत्रालय है।
वैसे भी सुशील मोदी बिहार के तीसरे ऐसे नेता हो गये हैं, जो चारों सदनों, लोकसभा, राज्यसभा, विधानसभा और विधान परिषद के सदस्य हुए हैं। इसके पहले लालू प्रसाद और नागमणि चारों सदनों से सदस्य हुए थे।

बिहार के राजनीति

हाशिए में नहीं मुख्यधारा में रहे हैं मोदी

यदि सुशील मोदी के अब तक ​के सियासी सफर को देखें तो ऐसा लगता है गैर राजनीतिक परिवार से निकल कर यहां तक सफर तय करने वाले सुशील मोदी तप कर ही कुंदन बने हैं। जिस सुशील मोदी को लालू जीवन पर्यंत स्टेपनी बुलाते रहे उसी सुशील मोदी के लगातार खुलासों का नतीजा है कि आज लालू यादव जेल में हैं और वहां से भी सियासत करने की लालू की कोशिश को सुशील मोदी लगातार पानी फेरते रहे हैं।

कैसे शुरू हुआ सियासी सफर

सुशील मोदी का जन्म बिहार की राजधानी पटना में 5 जनवरी 1952 को हुआ। उनके पिता का नाम मोती लाल मोदी और माता का नाम रत्ना देवी था। मोदी ने छात्र जीवन से ही अपनी राजनीतिक सफर की शुरुआत की थी। वो 1971 में पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ के 5 सदस्यीय कैबिनेट के सदस्य भी बने थे। इसके बाद उन्हे 1973-77 में डिप्टी सीएम पटना विश्वविद्यालय में छात्र संघ का महामंत्री बनाया गया और उसी साल बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव अध्यक्ष बने और रविशंकर प्रसाद संयुक्त सचिव चुने गए। उल्लेखनीय है कि भारत-चीन युद्ध, 1962 के दौरान सुशील कुमार मोदी काफी ज्याद सक्रिय रहे थे। उस दौरान उनको आम लोगों को शारीरिक फिटनेस का प्रशिक्षण देने के लिए सिविल डिफेंस के कमांडेंट नियुक्त किया गया था और फिर उसी साल सुशील मोदी ने आरएसएस की सदस्यता भी ले ली। मैट्रिक की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने आरएसएस के विस्तारक की भूमिका में दानपुर और खगौल में काम भी किया। बाद उन्हें पटना शहर के संध्या शाखा का हेड बना दिया गया। छात्र आंदोलन के दौरान सुशील मोदी 1972 में पहली बार 5 दिन के लिए जेल गए थे। उन्हें जेपी आंदोलन और आपातकाल के दौरान 1974 में पांच बार गिरफ्तार किया गया था। इस दौरान उन्हें 19 महीनों के लिए जेल में रहना पड़ा था।
1990 का यह वह साल है जब सुशील मोदी पूर्ण रुप से सक्रिय राजनीति में आ गए। 1990 के विधानसभा चुनाव में पटना सेंट्रल सीट (वर्तमान में कुम्हरार विधानसभा) से सुशील मोदी मैदान में उतरे और जीत हासिल की। इसके बाद वह इस सीट से दो बार चुनाव लड़े और उन्हें दोनों बार जीत हासिल हुई। सुशील कुमार मोदी को पहली बार 1995 में बीजेपी विधानमंडल का मुख्य सचेतक बनाया गया था और उसी साल उनके काम को देखते हुए पार्टी ने उन्हें राष्ट्रीय मंत्री भी बनाया था। 1996 से 2004 तक आठ साल तक बिहार विधानसभा में विपक्ष के नेता रहे। साल 2000 में सात दिनों की नीतीश सरकार में संसदीय कार्य मंत्री बने। 2004 में भागलपुर से लोकसभा के सांसद बने। साल 2004 में पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने उनके काम को देखते हुए उन्हें राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बना दिया और उसके अगले साल 2005 में उन्हें बीजेपी का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया। झारखंड गठन के प्रबल समर्थक सुशील मोदी 2005 में बिहार में एनडीए के शासन में आने पर लोकसभा से इस्तीफा देकर बिहार के उपमुख्यमंत्री बने। 2005 में ही नीतीश कुमार के नेतृत्व में बिहार में सरकार बनी और इस सरकार में सुशील मोदी बीजेपी की तरफ से डिप्टी सीएम बनाए गए। बता दें कि 2005 से लेकर 2013 तक सुशील मोदी बिहार सरकार में उपमुख्यमंत्री रहे और वो नीतीश के सबसे भरोसेमंद माने जाते थे। इसलिए नीतीश कुमार का भरोसा दोबारा जीतकर वो 2017 में दूसरी बार उपमुख्यमंत्री बने। और बिहार की एनडीए सरकार का सुशील मोदी संकट मोचक माना जाता है।

लगातार प्रेस कांफ्रेस कर लालू परिवार को घेरा

साल 2015 की बात करें तो विधानसभा चुनाव के बाद सुशील मोदी ने लालू यादव और उनके परिवार के खिलाफ संपत्ति बम फोड़ना शुरू कर दिया था। जमीन घोटाला, मॉल घोटाला,आय से ज्यादा सम्पति मामला और बेनामी सम्पति मामला सहित उस वक्त सुशील मोदी ने लगातार 90 दिनों तक प्रेस कॉन्फेंस की। जिसमें सुशील मोदी ने लालू यादव के किसी भी परिवार को नहीं बख्शा था। और इन्हीं आरोपों के दम पर सीबीआई और ईडी ने लालू परिवार पर शिकंजा कसना शुरू किया और 2017 जुलाई में लालू परिवार के खिलाफ केस दर्ज कर उनके कई ठिकानों पर छापा मारा। और ये वक्त वही समय था जब से नीतीश और आरजेडी में दूरी बढ़ती चली गई और फिर से नीतीश एनडीए में लौट आए और सरकार बनने पर सुशील मोदी उपमुख्यमंत्री बनाए गए।
2020 में एनडीए को मिली ​जीत के बाद सुशील मोदी के लिए केंद्र की राजनीति का नया सफर शुरू हुआ है और इस मौके भी सुशील मोदी ने कहा कि पार्टी नेतृत्व ने उन्हें संसद के दोनों सदनों में काम करने का मौका दिया है। राज्यसभा के सदस्य के तौर पर भी वे बिहार के विकास के लिए काम करते रहेंगे।

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